सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी कि “आरटीआई एक्टिविज्म एक नया धंधा बन गया है” व्यापक बहस का विषय है। यदि इस टिप्पणी को एक सामान्यीकृत दृष्टिकोण के रूप में ग्रहण किया जाए, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और सार्वजनिक कार्यों पर निगरानी को संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
लोकतंत्र केवल चुनावों से संचालित व्यवस्था नहीं है। उसकी वास्तविक शक्ति जागरूक नागरिकों, स्वतंत्र मीडिया, सामाजिक संगठनों और सूचना तक पहुँच के अधिकार में निहित होती है। सूचना का अधिकार कानून इसी उद्देश्य से बनाया गया था कि शासन अधिक पारदर्शी बने, सार्वजनिक धन के उपयोग पर जनता प्रश्न पूछ सके और प्रशासन जवाबदेह रहे।
यह भी उतना ही सत्य है कि किसी कानून का दुरुपयोग हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति आरटीआई या सामाजिक सक्रियता के नाम पर उत्पीड़न, ब्लैकमेल या अवैध हस्तक्षेप करता है, तो उसके विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई होनी चाहिए। किंतु कुछ मामलों में संभावित दुरुपयोग के आधार पर समूचे आरटीआई आंदोलन या नागरिक सक्रियता को संदेह के घेरे में खड़ा कर देना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंताजनक संदेश दे सकता है।
सार्वजनिक परियोजनाओं में भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण, अनियमित भुगतान और संसाधनों की बर्बादी जैसे अनेक मामलों का खुलासा नागरिकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयासों से हुआ है। यदि नागरिक यह महसूस करने लगें कि सरकारी कार्यों पर प्रश्न उठाना या जानकारी माँगना ही अनुचित माना जाएगा, तो इससे जवाबदेही की संस्कृति कमजोर पड़ सकती है।
साथ ही, यह भी आवश्यक है कि नागरिक सक्रियता कानून के दायरे में रहे। किसी निर्माण कार्य में बलपूर्वक बाधा डालना, सरकारी कर्मचारियों को डराना या प्रशासनिक प्रक्रिया को अवैध रूप से रोकना और दूसरी ओर दस्तावेज़ों के आधार पर प्रश्न उठाना—ये दोनों अलग-अलग स्थितियाँ हैं। न्यायालयों का दायित्व प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर निर्णय करना है, न कि केवल किसी व्यक्ति की घोषित पहचान, जैसे “आरटीआई एक्टिविस्ट”, के आधार पर।
भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सूचना तक पहुँच, शांतिपूर्ण असहमति और लोकतांत्रिक भागीदारी की भावना को महत्व देता है। नागरिक और राज्य के बीच संबंध केवल आदेश और पालन का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और संवाद का भी है। इसलिए ऐसी किसी भी सार्वजनिक टिप्पणी या संस्थागत दृष्टिकोण पर विमर्श होना स्वाभाविक है जो नागरिक सहभागिता के दायरे को सीमित करती हुई प्रतीत हो।
अंततः एक स्वस्थ लोकतंत्र में संतुलन आवश्यक है—न तो कानून के नाम पर अवैध हस्तक्षेप स्वीकार्य है और न ही सार्वजनिक हित में उठाए गए वैध प्रश्नों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। नागरिकों की सजगता, प्रशासन की पारदर्शिता और न्यायपालिका की निष्पक्षता—ये तीनों मिलकर ही संवैधानिक लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि वास्तविक दुरुपयोग और ईमानदार जनसरोकार के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए, ताकि जवाबदेही भी बनी रहे और नागरिक स्वतंत्रताएँ भी सुरक्षित रहें।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)